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Vol.6, Issue 1

Vol.7, Issue 1 & 2

SHODH SANCHAYAN

 

Vol.7, Issue.1 & 2, 15 Jan - 15 July, 2016

(Joint Issue)

ISSN  2249 – 9180 (Online)

Bilingual (Hindi & English)
Half Yearly

Print & Online

Dedicated to interdisciplinary Research of Humanities & Social Science

An Open Access INTERNATIONALLY INDEXED REFEREED RESEARCH JOURNAL and a complete Periodical dedicated to Humanities & Social Science Research.

मानविकी एवं समाज विज्ञान के मौलिक एवं अंतरानुशासनात्मक शोध पर  केन्द्रित (हिंदी और अंग्रेजी)

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Index/अनुक्रम

 

भारत में छात्र संगठन अपने जन्म से ही विवादित रहे हैं क्योकि स्वतंत्रता से पूर्व भारतीय नेताओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन में निरन्तर उन्हे जोड़ने का प्रयत्न किया। स्वतंत्र भारत में भी छात्र संगठन राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं रह सके और छात्र हितों की राजनीति धीरे धीरे छात्रसंघो की राजनीति में परिवर्तित हो गयी। छात्रसंघों का निर्माण संवैधानिक दृश्टि से अनुचित नहीं कहा जा सकता किन्तु युवा शक्ति के सही प्रबंधन के लिए छात्र राजनीति को अपने सही उद्देश्य पहचानने होंगे। यह शोध् पत्र छात्र संगठनों पर स्वतंत्रतापूर्व और स्वतंत्रता पश्चात पड़ने वाले राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण करते हुए छात्रसंघो की संवैधानिक और व्यावहारिक उपादेयता से सम्बन्ध्ति प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करता है।

Cities grow initially, benefiting from the increasing agglomeration economy, but after a certain stage due to congestion and crowding diseconomies set which has resultant in widening gap between available resources and their demand in urban areas. Every city is looking like a living organism. It takes birth, grows, prosper, make identity of its own and then exist for long period of time or get turn down due to negligence of its society or by the natural Disasters. Varanasi is one of the seven sacred cities of India, records a settlement history since ca. 1000 BCE.

This article is an attempt to analyze the historical development of Varanasi City from ancient period to post independent period and to highlight that this city is the complex mosaic of old and new religious culture and civilization. An attempt has been made to identify its individuality, appearance, problems, and precious suggestion for long-lasting enhancement of its uniqueness.

भारत एक समावेशी संस्कृति वाला राष्ट्र रहा है। भारतीय धर्म और संस्कृति का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि हमने हमेशा अच्छाई को आत्मसात किया है। इसी कारण जब विदेशी मूल की जातियों का भारतीय संस्कृति एवं धर्म से परिचय हुआ तो वे इसके प्रतिद्वन्दी नहीं बने अपितु उसके साथ घुल-मिलकर शासन-सत्ता को संचालित किया। प्रस्तुत शोध-पत्र में काद्र्दमक-वंशी क्षत्रपों के धार्मिक झुकाव विशेषकर जयदामन के शैव मतावलम्बी होने का पड़ताल किया गया है।

Purpose of the present study is to study the status of communicative Hindi speaking skill of junior level students of slum school. For this purpose a slum school situated in Ghaziabad city was selected randomly. There were total 30 students in VIII class. All the students were taken as the sample by cluster sampling technique. To see the status of communicative Hindi speaking skill of these students, four tests (one in written form and three in oral form) based on particular speaking skill components were administered.

यह शोध पत्र कोलाम जनजाति में प्रचलित प्रसवपूर्व देखरेख की पारंपरिक पद्धति से स्त्रियों की संबद्धता आधुनिक मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक कोलाम स्त्रियों की पहुँच तथा जन्म के समय निम्न भार के शिशुओं से संबंधित तथ्यों पर प्रकाश डालता है। शोध हेतु महाराष्ट्र राज्य के यवतमाल जिले की कलंब तालुका के अंतर्गत कुछ गांवों में निवासरत प्रजनन आयु की 116 विवाहित कोलाम स्त्रियों का यदृच्छ निदर्शन पद्धति द्वारा चयन किया गया। विषय से संबंधित तथ्यों का संकलन मई 2013 से जुलाई 2014 के दौरान किया गया। शोध के नतीजे यह दर्शाते है कि शासन द्वारा प्रदत्त आधुनिक प्रसव पूर्व सेवाओं से बड़ी संख्या में कोलाम स्त्रियां लाभान्वित हुई परंतु निर्धन कोलाम स्त्रियों में निम्न शैक्षणिक स्तर अल्पायु में विवाह तथा गर्भावस्था के दौरान अल्प आहार अल्प विश्राम तथा सतत् श्रम संबंधी दर्शन के परिणामस्वरूप कोलाम स्त्रियों द्वारा बड़ी संख्या में निम्न भार के शिशुओं को जन्म दिया गया।

भारत की तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए लार्ड माउन्टबेटन ने भारत की खण्डित आजादी को मूर्त रूप देने हेतु अपनी योजना को प्रकाशित करवाया। माउन्टबेटन योजना के अनुसार सत्ता हस्तांतरण की तरीख जून 1948 के वजाय 15 अगस्त 1947 कर दी गयी। भारत एवं पाकिस्तान के पास मात्रा यह विकल्प था कि वे 14 अगस्त की अर्धरात्रि से 15 अगस्त की अर्धरात्रि तक सत्ता हस्तांतरित कर लें। भारतीय राजनीतिज्ञ निजी जीवन में जब ज्योतिष के महत्त्व को स्वीकार करते थे, तो उन्होंने देश और समाज के संदर्भ में भी इस विध का उपयोग किया तथा 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को तुलनात्मक उचित मुहूर्त माना। पाकिस्तान ने 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि मे सत्ता संभाल ली, जबकि भारत ने ज्योतिष आधर पर 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को उचित समय चुनकर सत्ता प्राप्त की। विचारकों की मानें एवं तात्कालीन परिस्थितियों का आंकलन करें तो प्रारब्ध् एवं कालचक्र की भूमिका के कारण ही भारत पाकिस्तान से अधिक उन्नत तथा संगठित है।

Although it is an epic of modernization and technological advancement yet our ancient Indian values are still there in the modern society. Our ancient literature has been flourished with ancient Indian thoughts of learned people. The richest sources of our true knowledge are "The Vedas". Among all these Vedas Atharvaveda is based on medical science of India. Later on Ayurveda has been developed as separate branch of medical science. Thus, it can be conclude that ancient Indian wisdom has affected our modern medical science since a longer period of time and will also effect in future. With the presentation of this research paper the researcher wants to through light upon development of modern medical science and its relevance with ancient Indian wisdom.

Deviant behavior is any behavior that is contrary to dominant norms of society. There are many factors which cause a person to perform deviant behavior including biological explanation, sociological explanation and psychological explanation. Criminal and deviants are seen as sufferers of personality difficulties, such as, depression, stress, and dull-mindedness, less intelligence,inferiority complex, maladjustment and inappropriate behavior.

This paper mainly deals with crime as a result of abnormal dysfunctional or inappropriate mental process within the personality of the individual. These processes are inappropriate learning, improper conditioning and the absence of appropriate role model or presence of appropriate role model. Results show that presence of inappropriate role model increases crime rate along with the hereditary traits.

The appointment of Simon Commission (in 1927) was one of the most miscalculated moves by the British Government which infuriated Indians to no end. The Commission which was to decide upon the future of India did not have even a single Indian in it. When the non-cooperation movement lapsed and there was a lull in political activities the great political agitation against the commission gave direction to the Indian freedom movement. A common grievance – the complete exclusion of Indians from the membership of the commission, which was to pronounce on India’s fitness for self government brought together parties and politicians, who were really poles apart at that point of time.

प्रस्तुत शोध आलेख में भारतीय मदरसा शिक्षा व्यवस्था में निहित शैक्षिक एवं संरचनात्मक चुनौतियों की विस्तृत विवेचना की गई है। मदरसा शिक्षा व्यवस्था भारतीय मुसलमानों के जीवन का एक अभिन्न अंग हैं अतः इससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे मदरसों की पहचान बनाए रखने की नीति उनका सीमित दृष्टिकोण तथा कार्य प्रणाली पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है जो कि मुस्लिम समुदाय से सीधे जुड़े हुए हैं। इन चुनौतियों से निपटने की सरकार के प्रयास का जिक्र भी इस आलेख में किया गया है।

This article shares the experiences of the Community Legal Outreach Collaboration, Keele (CLOCK) by a student of Tata Institute of Social Sciences who underwent an exchange study programme funded by UK India Education and Research Initiative (UKIERI) at Keele University in the month of May - June 2015.

स्वातंत्रयोत्तर भारतीय जीवनशैली में तीव्र गति से जो परविर्तन हुए उसने समाज के प्रत्येंक वर्ग पर गहरा प्रभाव डाला। जिसके कारण भारतीय मध्यवर्ग की सामाजिक राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों में भी परिवर्तन आया। किसी भी साहित्यकार के लिए निंरतर परिवर्तित होती इन परिस्थितियों के उनुकूल सामाजिक यथार्थ को व्यक्त कर पाना मुश्किल था। किन्तु मन्नू भण्डारी ने यही सच है कहानी के माध्यम से इस सच को व्यक्त करने सार्थक प्रयास किया है। वैश्वीकरण की परिस्थितियों से प्रभावित नवीन जीवनशैली ने जिन सामाजिक मूल्यों एवं विचारों और मान्यताओं को हासिये पर ढकेल दिया था यी सच है  कहानी उसका यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती है।

सम्पूर्ण परिवर्तन में मीडिया का प्रभाव सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही रहीं है मीडिया के प्रभावस्वरूप एक तरफ जहाँ रचनात्मकता में वृद्धि हुई है वही विध्वंशात्मक प्रवृत्तियों का भी विकास हुआ है। प्रिन्ट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक की विस्तार यात्रा का समाज के प्रत्येक वर्ग पर सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। किन्तु सर्वाधिक प्रभाव हमें युवाओं पर देखने को मिलता है। युवा मन सदैव ही आसानी से  नवाचारों को ग्रहण कर लेता है और अपनी  प्रतिक्रिया भी त्वरित रूप से देता है। प्रस्तुत शोध् लेख में यह प्रदर्शित किया गया है कि स्वतंत्रता आन्दोलन से लेकर आजतक राष्ट्र निर्माण एवं सामाजिक परिवर्तन में युवाओं की सहभागिता सर्वाधिक रही है। सम्पूर्ण परिवर्तन में मीडिया का प्रभाव सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही रहीं है मीडिया के प्रभावस्वरूप एक तरफ जहाँ रचनात्मकता में वृद्धि हुई है वही विध्वंशात्मक प्रवृत्तियों का भी विकास हुआ है।

The Westphalian sovereignty bestowed upon the States an inviolable right of non- interference, non- intervention and self-governance. Sovereignty came to be treated as an international norm which was absolute, indivisible and supreme. Political construct of the concept further shaped in the context of nation-states. The principle of "sovereign equality" infused in the international system some sense of justness by improvising the established external aspect of states" sovereignty and then synthesising it with the principle of equality. "Equality of states" in the international order brought about a conceptual shift to the State Sovereignty as the independent and sovereign states voluntarily gave away the external aspect of their sovereignty for the membership of the international community. And this became the source of validity and strength to the international organisations. The external aspect of sovereignty of nations was trimmed in a way to let the international society establish where peaceful coexistence of the states could be ensured.

हिन्दी नवजागरण में महावीरप्रसाद द्विवेदी का वैशिष्ट्य उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व सृजन क्षमता विद्वता गहन शोधपरक मूल्यांकन निरीक्षण व अटूट हिन्दी सेवा में परिलक्षित होता है। उन्होंने सरस्वती जैसी पत्रिका को हिन्दी की सशक्त पत्रिका के रूप में प्रतिस्थापित कर हिन्दी प्रदेश में एक नयी सामाजिक चेतना का प्रसार किया है। उन्होंने हिन्दी नवजागरण में वैचारिक क्रान्ति उत्पन्न की। साथ ही वे नवजागरण से जुड़े लेखकों के प्रेरणास्रोत बने। प्रस्तुत शोधपत्र हिन्दी नवजागरण में आचार्य द्विवेदी के महत्व को रेखांकित करने का प्रयास करता है।

हिन्दी की सुप्रसिद्ध कथा लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने भारतीय ग्रामीण स्त्री को साहित्य की मुख्यधारा से जोड़कर उसके शोषणयुक्त संघर्षमय जीवन व स्वाभिमान को अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किया है। ‘फ़रिश्ते निकले’ शोषित, संघर्षशील व चेतना संपन्न ग्रामीण स्त्रियों की कहानियों का आख्यान है। स्त्री जीवन की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सच्चाईयों को मुखरित करने के लिए उक्त उपन्यास का समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करने तथा स्त्री विमर्श के दृष्टिकोण से कृति की समीक्षा करने का प्रयत्न प्रस्तुत शोध -पत्र में रहा है।

किन्नरों की हमारे समाज में तब से मौजूदगी रही है जब से मनुष्य जन्में हैं। किंतु इनकी चर्चा अगर मोटे तौर पर देखे तो महाभारत के समय में दिखती है। महाभारत में शिखण्डी नामक किन्नर भीष्म पितामह की हत्या का कारण बनी और अपनी वर्षें पहले की प्रतिज्ञा पूरी की।...यदि किन्नरों की स्थिति पर विचार किया जाए तो समाज में प्रायः दो तरह से लोग किन्नर बनते हैं- एक जो जन्मजात किन्नर होते है और दूसरे वे जिन्हे जबरदस्ती या अपनी मर्जी से बनाया जाता है।... साहित्य में प्रदीप सौरभ द्वारा लिखी ‘तीसरी ताली’ नामक किताब ने तो धूम मचाई थी ही किंतु अब लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी द्वारा लिखी आत्मकथा ‘मैं लक्षमी, मैं हिजड़ा’ ने भी तहलका मचा दिया है।

भारत में मीडिया की भूमिका सदैव सकारात्मक रही है। राष्ट्र निर्माण में समाज के सजग प्रहरी के रुप में दैनिक भास्कर द्वारा अनेको समस्याओं जैसे, स्वच्छता, पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा, स्वस्थ्य एवं शिक्षा के प्रति लोगों को जागृत किया बल्कि सरकार व शासन तक इन समस्याओं को उठाकर समाज के सजग सचेतक के दायित्व का निर्वाह किया। यह शोध् आलेख दैनिक भाषा के काव्य से इन सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूकता लाने में भूमिका का मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में व्यापक श्रमशक्ति कृषि क्षेत्र से अपनी आजीविका कमाती है। उन्नत कृषि दशाओं में कृषि से ही  सम्बद्ध गैर-फर्म रोजगार अवसर बढ़ने के अतिरिक्त जनसंख्या को रोजगार दिया जा सकता है। कानपुर देहात जनपद की अर्थव्यवस्था ग्रामीण अर्थव्यवस्था है। यहाँ की अर्थव्यवस्था कृषि उत्पादन, आय और उद्योगों के उद्भव और विकास का आधारित है। अकबरपुर विकासखण्ड कृषि आधरित औद्योगीकरण का लाभप्रद और सम्भाव क्षेत्र है। कानपुर देहात जनपद में कृषि आधरित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है क्योंकि इस जनपद में इन उद्योगों की समृद्धि एवं विकास की पर्याप्त  दशायें प्रवर्तमान है। यह अध्ययन कृषि आधरित उद्योगों की वर्तमान स्थिति एवं कृषि आधारित उद्योगों में रोजगार सृजन एवं आय सृजन की संभावना को प्रस्तुत करता है।

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