Vol. 16, Issue 1 & 2
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Vol. 16, Issue 1 & 2

Vol.16, Issue 1 & 2

SHODH SANCHAYAN

Vol.16, Issue.1 & 2, 15 Jul, 2025

ISSN  2249 – 9180 (Online)

Bilingual (Hindi & English)
Half Yearly

Print & Online

Dedicated to interdisciplinary Research of Humanities & Social Science

An Open Access INTERNATIONALLY INDEXED PEER REVIEWED REFEREED RESEARCH JOURNAL and a complete Periodical dedicated to Humanities & Social Science Research.

मानविकी एवं समाज विज्ञान के मौलिक एवं अंतरानुशासनात्मक शोध पर  केन्द्रित (हिंदी और अंग्रेजी)

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Index/अनुक्रम

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नाथ साहित्य भारतीय वांग्मय में दार्शनिक चिंतन और साधना पद्धति का संधिकाल है। इस साहित्य का मुख्य स्वर अंतः शुद्धि, इन्द्रिय -निग्रह और नैतिक शुचिता है। नाथों का युग धार्मिक संघर्ष का युग था। जिसमें ब्राह्मण, बौद्ध, जैन, इस्लाम, वैष्णव, शैव, सगुण, निर्गुण, संत, भक्त और योगी संघर्षरत रहें। इस पंथ का मूलाधार हठयोग है, जहाँ ‘ह’ सूर्य और ‘ठ’ चंद्र के योग से प्राण वायु को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित किया जाता है। कुंडलिनी जागरण और षटचक्र भेदन द्वारा शून्य समाधि द्धसहज अवस्था की प्राप्ति ही इसका परम लक्ष्य है। प्रस्तुत आलेख में नाथ पंथ की हठयोग साधना का सूक्ष्म विवेचन किया गया है।

Copyright Act is one very important act in India to protect the rights of the artist. But the violation of Copyright Act has also become a very common incident. We often read the news of violation of Copyright Act. The emergence of digital technology has also made it convenient. Now it has become easy for some people to violate this law using smartphones or other such devices. Several cases of violation of Copyright Act are reported. The news about different aspects of violation is often published in different media. This study is an attempt to find the present status of Copyright Act. It has tried to study the cases of violation of Copyright Act in various media and the role of judiciary in this matter.

प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य शासकीय एवं अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक शिक्षिकाओं की शिक्षण अभिवृत्ति अध्ययन करना है। इस अध्ययन के लिये औरैया जनपद के शासकीय एवं अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत 60 शिक्षक-शिक्षिकाओं का चयन यादृच्छिक न्यादर्श विधि से किया गया है। आंकड़ों को संकलित करने के लिये डॉ0 जे0सी0 गोयल द्वारा निर्मित टीचर एटीटड्ढूड स्केल (TAS-GJ) का प्रयोग किया गया तथा आंकड़ों का विश्लेषण मध्यमान मानक विचलन ज् अनुपात सांख्यिकीय विधियों द्वारा किया गया।

This study examines the impact of socio-economic status (SES) on the stress levels of senior secondary students. Using a sample (100) from Chhaprauli Town, Baghpat district, the research explores how SES influences stress among boys and girls. The study reveals significant differences in stress levels between high and low-SES students, with notable variations between genders. The findings underscore the critical role of socio-economic factors in shaping the psychological well-being of students at this educational stage. These findings highlight the need for targeted interventions to address stress among students, particularly those from low socio-economic backgrounds. Students from lower socio-economic backgrounds reported higher stress levels compared to their peers from higher socio-economic backgrounds.

आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि भारत-रूस संबंधों का इतिहास वर्ष 1947 से प्रभावी ढंग से शुरू हुआ। ये वही दौर था जब दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ राजनयिक संबंध स्थापित हुए। किंतु यह धारणा ऐसे पूर्वाग्रहों से प्रभावित है, जो दोनों देशों के मैत्री संबंधों के प्राचीन इतिहास को न्यूनतम बना देता है बल्कि कुछ हद तक उन्हें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आयामों से वंचित कर देता है। राजनयिकों के आपसी आधिकारिक राजपत्रों के आदान-प्रदान से बहुत पहले ही कई रूसी यात्री, व्यापारी, सैनिक, संगीतकार, चित्रकार तथा विद्वान भारत की यात्रा संभव बना चुके थे। उन्होंने अपने पीछे बहुत से यात्रा-वृत्तांत और ज्ञान-विज्ञान की बौद्धिक परंपराएँ छोड़ीं, जिसने धीरे-धीरे रूस में भारत की एक स्थायी पहचान तथा दोनों सभ्यताओं के बीच पारस्परिक साझेपन की बुनियाद रही। प्रस्तुत शोध-पत्र में भारत-रूस मैत्री संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में रूसी यात्रियों के योगदान को विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है।

वर्तमान युग विमर्श का युग रहा है। इन विमर्शों में से स्त्री विमर्श ने स्त्री जीवन में बदलाव करने का एक सार्थक प्रयास किया है। विचारणीय बात यह है कि क्या इस बदलाव के साथ साहित्य और आम जीवन की भाषा में भी बदलाव आया है? क्या पुरुष वर्चस्व का विरोध करने वाला और पितृसत्तात्मक व्यवस्था व तंत्र को ख़त्मकर समतामूलक समाज के निर्माण के लिए संघर्शरत और आंदोलनरत स्त्री लेन भाषा में ऐसा बदलाव कर पाया है। प्रस्तुत शोधपत्र में हिंदी स्त्री आत्मकथाओं की भाषा के संदर्भ में इसी पर विचार किया जाएगा, कि भाषा की दृष्टि से स्त्री जीवन के सवालों और उनका संघर्श किस प्रकार से भाषा और उसकी बुनावट में परिवर्तन करते हुए स्त्री मुक्ति के प्रश्नों को रेखांकित किया है और साहित्यिक भाषा में बदलाव आया है।

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी भी समाज की पहचान, उसकी सामूहिक स्मृति और उसके सांस्कृतिक मूल्यों की सबसे सच्ची वाहक होती है। भारत और रूस के बीच आधुनिक राजनयिक संबंधों के सात दशकों तथा सदियों पुराने सांस्कृतिक-साहित्यिक संबंध इस तथ्य के सबसे प्रामाणिक साक्ष्य हैं। यह शोध पत्र इस केंद्रीय तर्क को प्रस्तुत करता है कि भारत-रूस मैत्री की वास्तविक और टिकाऊ नींव किसी सैन्य संधि या आर्थिक सौदे में नहीं, बल्कि उस भाषाई और साहित्यिक संवाद में है जो दोनों समाज को दशकों से एक-दूसरे के करीब लाता रहा है।शोध का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि भाषाई कूटनीति (Linguistic Diplomacy) अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की वह आधारशिला है जो राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल में भी दोनों देशों के रिश्तों को जीवित और सक्रिय रहती है। भारत-रूस का दोस्ताना अनुभव यह साबित करता है कि जब दो समाज की भाषा परस्पर संवाद करती है, तो उनके मध्य एक ऐसी अटूट विश्वास जुड़ा होता है जिसे कोई प्रतिबंध या कोई राजनीतिक परिवर्तन तोड़ नहीं सकता। यह शोध हिन्दी और रूसी भाषा के बीच के ऐतिहासिक, भाषावैज्ञानिक और सांस्कृतिक संबंधों का एक विस्तृत और बहु-सैद्धांतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है.


Environmental governance in India exemplifies an intricate interplay between aspirational policy frameworks and practical implementation challenges. With the nation's rapid industrialization and growing population, ecological challenges have intensified—pollution, deforestation, climate vulnerability, and resource depletion necessitate immediate, coordinated action. This paper rigorously analyzes India's environmental governance framework, detailing its progression from constitutional provisions to significant legislation, such as the Environment Protection Act (1986), and current initiatives, including the National Action Plan on Climate Change (NAPCC) and community-focused programs. Despite India's establishment of a strong legal and institutional framework, other enduring issues persist, including inadequate enforcement, institutional fragmentation, restricted public engagement, and the ongoing conflict between development and conservation. This article contends that India's environmental future depends on strengthening participatory governance, augmenting institutional capacity, promoting transparency, and adopting human rights-based methodologies, as evidenced by recent scholarship and policy analysis.

प्रस्तुत शोध-आलेख का उद्देश्य चंद्रधर शर्मा गुलेरी की अपेक्षाकृत कम चर्चित और कम विवेचित आरंभिक कहानियों - ‘सुखमय जीवन’ और ‘बुद्धू का काँटा’ में निहित संवेदनाओं, सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों तथा उनकी वैचारिक अंतर्धाराओं का अध्ययन करना है। साथ ही, इन दोनों कहानियों की प्रस्तुति, प्रवृत्ति, सोद्देश्यता, कथा-भाषा, शिल्पगत संरचना तथा हिंदी कहानी के आरंभिक कला-रूपों को समझना भी इस आलेख का प्रमुख उद्देश्य है। इस अध्ययन की केंद्रीय स्थापना यह है कि गुलेरी जी की आरंभिक दोनों कहानियाँ केवल कथा-रचनाएं नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक आलोचना का दायित्व भी वहन करती हैं। इन कहानियों में कथा और आलोचना परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे की पूरक बनकर उपस्थित हैं। इस अर्थ में ये रचनाएं स्वयं आलोचनात्मक चेतना की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति अथवा आलोचना के प्रतिरूप के रूप में देखी जा सकती हैं। गुलेरी जी ने अपनी आरंभिक कहानियों को सामाजिक-सांस्कृतिक आत्मपरीक्षण और आलोचना-कर्म के साँचे में ढालकर हिंदी कहानी के लिए एक नए कथात्मक ढाँचे और वैचारिक दिशा का प्रस्ताव किया था। यही दृष्टि उनकी कहानियों को हिंदी कथा-साहित्य के इतिहास में विशिष्ट और पुनर्पाठ योग्य बनाती है।

राष्ट्रीयता आधुनिक समाजों के एकीकरण का आधार है। ए. आर. देसाई और जॉन स्टुअर्ट मिल के अनुसार, यह एक दीर्घकालिक ऐतिहासिक व सांस्कृतिक प्रक्रिया है, जो एक निश्चित भू-भाग, साझी भाषा, आर्थिक शैली, सांस्कृतिक एकात्मकता और ऐतिहासिक स्मृतियों से निर्मित होती है। भारत में राष्ट्रीयता का विकास अत्यंत जटिल, बहुमुखी और बहु-सांस्कृतिक रहा है। इसका उत्थान 19वीं सदी के उत्तरार्ध में, राजनीतिक पराधीनता के दौर में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के आर्थिक शोषण के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन लेखकों (जैसे बालकृष्ण भट्ट) ने अपने लेखन से औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ जन-जागरण फैलाया। रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार, भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का जन्म राजनीतिक राष्ट्रीयता से पहले हुआ था। यह लेख स्पष्ट करता है कि भारतेंदुयुगीन साहित्य का मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक शोषण को उजागर कर स्वधर्म, स्वदेशी, स्वभाषा और स्वराज के माध्यम से देश की उन्नति एवं राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करना था।

सुशीला टाकभौरे का काव्य समकालीन दलित-स्त्री विमर्श का एक देदीप्यमान प्रतिमान है, जो जातिगत दंश और पितृसत्तात्मक वर्चस्व की दोहरी कटीली बेड़ियों को छिन्न-भिन्न करता है। उनकी कविताएँ पारंपरिक नारी-आदर्शों के कल्पित आभामंडल को नकारकर वंचित स्त्री की जिजीविषा, अस्मिता और मुऽर विद्रोह को स्वर देती हैं। फूले-अंबेडकरवादी दर्शन से अनुप्राणित उनकी लेखनी सहानुभूति के बजाय समान अधिकार, आत्मपहचान और समतामूलक मानवीय गरिमा की संप्रभु मांग करती है। संक्षेप में, टाकभौरे का रचना-संसार सदियों के थोपे गए मौन और लाचारी का उत्सर्ग कर एक स्वायत्त, वैचारिक रूप से प्रबुद्ध और संघर्षशील चेतना का मार्ग प्रशस्त करता है

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